Posted in Poem

सन्नाटा..


रात के उस समय ,

जब पूरी दुनिया सोयी थी..,

अकेली एक चीज़ साथ थी ..,हाँ , वो वही थी!!

घडी की टिक-टिक के साथ ..,

जानवरों का शोर!!

उस रात वो कुछ तो मशगुल थी ;

कुछ ढूंडती उस सन्नाटे में., यादों का पिटारा खोली थी!!

ये सोचती की इस दुनिया में कौन अपना,कौन पराया ,

बस अपनी परछाई पहचानी थी!!

सोचती की ओहदा बड़ा कि इंसानियत..,

दुनियादारी अभी समझी थी!!!

लोगो को अभी जाना था ;

फिर से  वो वही अटकी थी!!

यादों की मीठी चाशनी में करेले की कर्वाहट घोली थी..,

लोगो को बिना जांचे ,अपना बनाने की जो ठानी थी ;

हँसते ,हँसते रोने की आदत जो उसने पाली थी..,

हँसते, हँसते रोने की आदत जो उसने पाली थी!!

Author:

I'm a law student at a private uni. Apart from being an enthusiast in political developments of the world, I also believe myself to be an eloquent writer. Nationalist on grounds, I like discussing about issues which matter my country and the world at large. बाकी कविताएँ तो देख ही ली होगी!

One thought on “सन्नाटा..

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s