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बचपन….


मैं जीवन जीने के काबिल हूँ या नहीं,

बस मुझे जीना सिखा दो!!

अगर लौट के आ सकता है मेरा बचपन,

तो लौटा दो उसे मुझे,बिना किसी अनबन!!

वरना इस दुनिया में…

न तो ज़मीर रहेगा जिंदा,

और,न ही कबीर करेगा बुराई की निंदा,

चाहे बन जाये कितना भी बड़ा गरीब(अमीर),

कभी दिल में फ़क़ीर न होगा जिंदा!

जब लौट आएगा वापस हमारा बचपन…

तो और भी खुबसूरत,

और भी ऊचाँ,

मेरे देश का नाम हो जायेगा,

हिन्दू-मुसलमान नही,सिर्फ इंसान ही इंसान पुकारा जायेगा!

चाहे कितनी बार ही क्यों न गिरो, हर बार एक नया मौका मिलता जायेगा,

ऐसा नही की गलती करने की आदत पड़ जाएगी,

पर गलती करके सही रास्तें की पहचान हो जाएगी!

रिश्ते भूल सिर्फ निंदा और लालच जानते है अभी सब,

जब लौट आएगा वापस हमारा बचपन,

तो मासूमियत के अलावा कुछ न रह जाएगा तब!

जिंदगी शतरंज के जैसी हो गयी है,इसे सूडोकु के समान बनाना चाहिए,

हर मौके पर फतह नहीं,सिर्फ सही रहना आना चाहिये…

Author:

I'm a law student at a private uni. Apart from being an enthusiast in political developments of the world, I also believe myself to be an eloquent writer. Nationalist on grounds, I like discussing about issues which matter my country and the world at large. बाकी कविताएँ तो देख ही ली होगी!

7 thoughts on “बचपन….

  1. It’s really nice , but rhyming nhi ban rhi . Sorry, don’t mind . Thoughts , emotions brilliant h bas thoda rhyme pr dhyan dena . Pure lines ko likhne k jgh ,poetic way mh likhna. All the best👍

    Liked by 1 person

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